तनहाई से इकरार

मजा तो बस भ्रम था , अश्कों की जरूरत थी और रोते को चुप करना बहाना था , दुखियो को गले लगाया अश्कों को जो बेचना था , भटके को राह दिखा के अपना राह जो बनाना था।


अब प्यार है हमें तनहाई से इकरार
बड़ी मुश्किल है ये जानना हमसे प्यार है कितना।
बड़ी बंदिसो से चाहने की गुस्ताखी की हमने क्या पता प्यार का मौसम कब आएगा, बड़सेगी वो घटा बन के तरस रहा हूं मै उसके बूंद लिए।


अपनो के खोने का दुख और उनके दिए दुखो को झेलने का सुख , हर किसी के नसीब में होता है , और ये सारे सुख पैसों से तौले जाते है, बड़े बदनसीब होते है वे लोग जिनके पास पैसे तो होते है लेकिन अपने लोग नहीं।

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